Wednesday, 28 May 2014

मैं और मेरी fantasy





लगा जैसे सदियों बाद
मिल रहे थे  हम 
अब तक न जाने  
कहाँ गुम थी वो 
मौनी  बाबा बन 
खो दी उसने अपनी चंचलता 
अपनी  रचनात्मकता 
पर अब भी उसकी 
आँखों से  कहीं  मासूमियत 
झलक रही थी 
मानो  पूछ  रही हो 
क्या मैं अब भी उतनी ही
नादान हूँ  अल्हड़ हुँ  
क्या आज भी तुम हसोगी मुझ पर
या फिर मेरी खिल्ली उड़ाओगी 
दोस्तों के बीच 
या कहीं कोने में फेंक दोगी
या  फिर मुझे नीच दिखने का 
कहीं कोई नया 
तरीका सोच रखा है  

मैंने भी उससे कह दिया 
आज इतने दिनों बाद 
तुम्हे  लज्जा की पड़ी  है
तो सुन लो  
तुम तो वजह थी  हमारे 
खुसमिजाज स्वभाव   की 
हमारे नाकामयाब इरादो 
पर भी हसने की  
मै  तो तुम्हे  साथ रखना चाहती थी 
खूब बातें बनाना चाहती संग तेरे 
पर समय ने ऐसा झकझोरा की   
न जाने कब हाथ  छूट गया तुम्हारा 
खोज भी करनी चाही तो
Google Facebook Twitter ने 
जैसे  हाथ खड़े  कर दिए हो 
कहते No result found
तेरा साथ न पा कर निरर्थक हो जाया करती थी 
दिल और दिमाग दोनों हँसा करते थे  
मेरी नासमझी पर  
थक कर रोज बालकॉनी   में खड़े हो 
चौमुहाँ पर नजर दौड़ाया करती 
और देखो आज मेरी खोज सफल हुई 

आज जब तुम मिल गयी हो 
तो चलो एक  सुरक्षित जगह खोजते है 
जहाँ मैं तेरी अतुल्य कल्पनाओ को संजो सकूँ 
तुमसे जी भर बातें कर सकूँ 
और संग तेरे नयी कहानियों का पिटारा बुन  सकूं 


 अबकी बार हाथ नही छोड़ना  साथ नही छोड़ना 

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