कुछ रिश्ते बिल्कुल
"Anonymous" शब्द जैसे
अस्पष्ट होते है
गुमनामी का
झण्डा फहराते हुए
बेजुबानी की मिशाल होते है
न जाने कब कहाँ कैसे
किसके साथ निभ जाते है
अपनी पहचान बनाने के पहले ही
गुमराह हो जाते है
शायद भूल जाते है
अपने अस्तित्व को
भूल जाते है
रिश्तो की अहमियत को
काल्पनिक दुनिया
बनाने लग जाते है
जहाँ रिश्तो से कोई रिश्ता नहीं
और दूजे सा कोई भाता नही
काश गर हर पहली मुलाकात
को एक नया नाम दे पाते
कुछ मजेदार होता जरूर उस नाम में
और शायद माथा पच्ची भी कम करनी पड़ती
रिश्तो की हायरार्की को समझने में
पर यार अब कौन पीड़ा उठाये
इन बढ़ते नजदीकियों का नामांकरण करने में
कौन फिर से इन नए रिश्तो को परिभाषित करे
चलने दो उसी हीर रांझा ,करण अर्जुन ,
और लाखो ऐसी रिश्तो की कहानीयो को
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