Friday, 30 May 2014

सताती यादें



आया हू तेरे शहर आज
सूरज की बाहों मे
लागे है तेरे छाव जैसा सबकुछ
ये साँसे भी कही  उर्जा पैदा करती नज़र आती आज

तू ना मिली  तो क्या हुआ 
हू तो मै आज  भी दीवाना तेरा 
  
देखना तो आज ये है की
तेरे मौला कैसे बुरखे मे छुपाते है  
और भगवान  किस मंदिर मे घूंघट तले समेटते है तुझे
चर्च  के किस कोने मे बैठाते है तेरे मसीआ
और किस रंग की दस्तार(टर्बनसे गुरु साहिब  ढँकते है तुझे

तू ना मिली तो क्या हुआ 
आज भी वही ललक है इस मजनूँ की आँखो मे

देखना है की तू आज भी उसी मासूम कली जैसी हो
या फिर धारण किया है नया रूप कोई
क्या तुम मे आज भी उतनी ही उबाल है
या किसी ने शांत बना दिया  है  तुझे

तू ना मिली तो क्या हुआ
आज भी दिल उतना ही जवां है 

सुनना है तेरे मीठे खिलखिलाहट को
तेरी बचकानी बातों को
धड़कन की धुनो  को
और तेरे अमोघ इरादों को

तू ना  मिली तो क्या हुआ
तेरी यादें महफूज़ है पूरी जिंदगी काटने को

महसूस करना है तेरी रूह को  
महफ़िल मे समाना है तेरे        
भिगोना है खुद को तेरे हर पल मे   
तेरी उड़ानों का साक्षी बनना  है

तू ना मिली तो क्या हुआ
आज भी मेरी हर लेखनी मे तुम ही हो

आज तो तुम्हे खोज ही निकालूँगा
आना ही पड़ेगा  तुम्हे
जुड़ना  पड़ेगा तुम्हे अपने अस्तित्व से
और जगमगा जाना  होगा  
इस पाँच फुट चार इंच के बेचैन अंधेर गलियारे को

लौट आओ मेरी रौशन दीप 














Wednesday, 28 May 2014

हाथ ना आती समय



तुमने ना कोई पंख  लगा रखा है
ना तुम उनोखे जीवो(परियों) मे से एक हो
और हाँ तुम कोई हवाई जहाज़ तो हो नही
जिसे ईंधन से उडाया  जा सके
तो फिर हाथ क्यू ना आती हो?


तुम तो कहती थी की तुम प्राणियो की सखी  हो
जिसे वो हमेशा साथ रख चल सकता है
पर नहीं,मैने तो तुम्हे चहचहाते देखा था
वो भी उन लम्हो पर
जब भीगे हुए पलके दर्द बयान करते थे


तुमने ये भी कहा था की तुम खुले आसमान तले
एक अमोल रत्न की तरह हो
एक चिंगारी की तरह हो
पर नही,तुम साथ  आओ तब तो तुम्हे सुलगाए
और हाथ आओ तब तो तेरी मूल्यांकन करे


तेरी खिदमत मे ये तक सुना था की
पछताते है वो जो तुझसे मेल ना रख पाते
तेरे खटखटाहट को सुन ना पाते
तुझपे थोपते अपनी पापो की टोली  को
और निर्दोष बन उड़ते फिरते है


मै भी हू उसी आकाशगंगा की प्राणियो मे से एक
जिसे तेरी अभिमान की भनक  पड़ी थी कभी
हमने भी कोशिशे की थी तुम्हे झांसा देने की
तुमसे निगाहे चुराने के
तुझे छल से पीछाड़ने की


पर तूने आज इतना तो एहसास करा ही दिया
की अनेक रंगो से रंगा है तूने मुझे
शांत गलियाँ से निकाला है
जहाँ ना कुछ सौम्या सा भाता था
और ना ही सुरीली बातें समझ मे आती थी


अब इतना भी रौब मत दिखा
तुम भी कहाँ जाओगी इस भाग्य को ले कर
ऐसे रूखे व्यवहार तो और किसी जमघट मे स्वीकारे भी ना जाए
थोड़ी कम कर दे अपनी रफ़्तार,फिर हम चलेंगे ना साथ साथ
उन अनछुए राहो को खदेड़ने के लिए



समय की दीप












Anonymous

कुछ रिश्ते बिल्कुल
"Anonymous" शब्द  जैसे 
अस्पष्ट होते  है
गुमनामी का
झण्डा फहराते हुए
बेजुबानी की मिशाल होते है 

न जाने कब  कहाँ कैसे
किसके साथ निभ जाते है
अपनी पहचान बनाने के पहले ही 
गुमराह हो जाते है 
शायद भूल जाते है
अपने अस्तित्व को 

भूल जाते  है   
रिश्तो की अहमियत को 
काल्पनिक दुनिया
बनाने लग जाते है 
जहाँ रिश्तो से कोई रिश्ता नहीं
और  दूजे सा कोई भाता नही  

काश गर हर पहली मुलाकात
को एक नया नाम दे पाते
कुछ मजेदार  होता जरूर उस नाम में
और शायद माथा पच्ची भी  कम करनी पड़ती   
रिश्तो की हायरार्की को समझने में 

पर यार अब  कौन पीड़ा उठाये  
इन बढ़ते नजदीकियों का नामांकरण करने में
कौन फिर से इन नए रिश्तो को परिभाषित करे
चलने दो  उसी हीर रांझा ,करण अर्जुन ,
और लाखो ऐसी रिश्तो की कहानीयो को






















मैं और मेरी fantasy





लगा जैसे सदियों बाद
मिल रहे थे  हम 
अब तक न जाने  
कहाँ गुम थी वो 
मौनी  बाबा बन 
खो दी उसने अपनी चंचलता 
अपनी  रचनात्मकता 
पर अब भी उसकी 
आँखों से  कहीं  मासूमियत 
झलक रही थी 
मानो  पूछ  रही हो 
क्या मैं अब भी उतनी ही
नादान हूँ  अल्हड़ हुँ  
क्या आज भी तुम हसोगी मुझ पर
या फिर मेरी खिल्ली उड़ाओगी 
दोस्तों के बीच 
या कहीं कोने में फेंक दोगी
या  फिर मुझे नीच दिखने का 
कहीं कोई नया 
तरीका सोच रखा है  

मैंने भी उससे कह दिया 
आज इतने दिनों बाद 
तुम्हे  लज्जा की पड़ी  है
तो सुन लो  
तुम तो वजह थी  हमारे 
खुसमिजाज स्वभाव   की 
हमारे नाकामयाब इरादो 
पर भी हसने की  
मै  तो तुम्हे  साथ रखना चाहती थी 
खूब बातें बनाना चाहती संग तेरे 
पर समय ने ऐसा झकझोरा की   
न जाने कब हाथ  छूट गया तुम्हारा 
खोज भी करनी चाही तो
Google Facebook Twitter ने 
जैसे  हाथ खड़े  कर दिए हो 
कहते No result found
तेरा साथ न पा कर निरर्थक हो जाया करती थी 
दिल और दिमाग दोनों हँसा करते थे  
मेरी नासमझी पर  
थक कर रोज बालकॉनी   में खड़े हो 
चौमुहाँ पर नजर दौड़ाया करती 
और देखो आज मेरी खोज सफल हुई 

आज जब तुम मिल गयी हो 
तो चलो एक  सुरक्षित जगह खोजते है 
जहाँ मैं तेरी अतुल्य कल्पनाओ को संजो सकूँ 
तुमसे जी भर बातें कर सकूँ 
और संग तेरे नयी कहानियों का पिटारा बुन  सकूं 


 अबकी बार हाथ नही छोड़ना  साथ नही छोड़ना