आया हू तेरे शहर आज
सूरज की बाहों मे
लागे है तेरे छाव जैसा सबकुछ
ये साँसे भी कही उर्जा पैदा करती नज़र आती आज
तू ना मिली तो क्या हुआ
हू तो मै आज भी दीवाना तेरा
देखना तो आज ये है की
तेरे मौला कैसे बुरखे मे छुपाते है
और भगवान किस मंदिर मे घूंघट तले समेटते है तुझे
चर्च के किस कोने मे बैठाते है तेरे मसीआ
और किस रंग की दस्तार(टर्बन) से गुरु साहिब ढँकते है तुझे
तू ना मिली तो क्या हुआ
आज भी वही ललक है इस मजनूँ की आँखो मे
देखना है की तू आज भी उसी मासूम कली जैसी हो
या फिर धारण किया है नया रूप कोई
क्या तुम मे आज भी उतनी ही उबाल है
या किसी ने शांत बना दिया है तुझे
तू ना मिली तो क्या हुआ
आज भी दिल उतना ही जवां है
सुनना है तेरे मीठे खिलखिलाहट को
तेरी बचकानी बातों को
धड़कन की धुनो को
और तेरे अमोघ इरादों को
तू ना मिली तो क्या हुआ
तेरी यादें महफूज़ है पूरी जिंदगी काटने को
महसूस करना है तेरी रूह को
महफ़िल मे समाना है तेरे
भिगोना है खुद को तेरे हर पल मे
तेरी उड़ानों का साक्षी बनना है
तू ना मिली तो क्या हुआ
आज भी मेरी हर लेखनी मे तुम ही हो
आज तो तुम्हे खोज ही निकालूँगा
आना ही पड़ेगा तुम्हे
जुड़ना पड़ेगा तुम्हे अपने अस्तित्व से
और जगमगा जाना होगा
इस पाँच फुट चार इंच के बेचैन अंधेर गलियारे को
लौट आओ मेरी रौशन दीप
