Tuesday, 19 January 2016

एक पन्ने से मुलाकात




न जाने कहाँ से उड़ कर आया था
थम गया था देख मुझे
थक गया था
न उड़ने की बातें कर रहा था
शायद बयां कर रहा था
अपनी कहानी
अब ठहरना चाहता था
परिभाषित होना चाहता था
उसकी आत्मकथा सुन रही थी
और बेंच पर बैठे सोच रही थी
किसकी वर्णन करूँ
इस संकुचित पन्ने के टुकड़े में
इस सिमित शब्द ज्ञान से
कैसी शेर शायरी लिखूँ
किसकी तस्वीर बनाऊँ
इन अनुभवहीन हाथों से
किसे सन्देश लिखुँ
इन व्यस्त लोगों में
जेम्स बांड की किस मिस्ट्री
को हल करूँ मैं
काफी देर से निहार रही थी
उसकी कहानी सुने जा रही थी
क्या पता था वो मेरा नहीं
किसी कूड़ेदान में फेके जाने का
इंतज़ार कर रहा था

Sunday, 17 January 2016

बेचैन मन

Soul at peace






आज मन बेचैन है
पता नहीं कहाँ जाना चाहता है
आसमान में उड़ना चाहता है
या समुद्र में गोते लगाना
इतना अस्पस्ट न जाने क्यों है
पता नहीं क्या चाहता है
रास्ते तय करना चाहता है
या रुख बदलना
कोई संकेत भी न नजर आ रहा
पता नहीं क्या चाहता है
किसी ख़ास से बातें करना चाहता है
या चुप्पी साधना
इतनी उधेड़बुन में है
मानो आइंस्टीन
की थेओरी ऑफ़ रिलेटिविटी
तैयार कर रहा हो
इन्द्रियों ने अभी अभी
अनुमान लगाया है कि
ज्यादा कुछ नहीं
ये मन बस अपनी अस्तित्व का
एहसास दिलाना चाहता है