Friday, 28 August 2015

बहन की कलम से


है बिगाड़ते है सँवारते
है रुलाते है हँसाते
है सताते है दुलारते
हर दिन रिश्ते में हम
एक नया गाँठ है बाँधते

इस प्यारे से नटखट रिश्ते की बुनियाद
माँ पापा ने रची थी किसी रोज
जन्म से पहले ही सारे खिलौनों
को तैयार कर रखा था हमने
मेरे सारे कपड़े जैसे तेरे होने वाले थे

इतनी बेचैनी तो मुझे कभी न हुई हो
आए दिन नयी नयी कहानियाँ बुनती
गिरती संभालती उलझती सुलझती
हर सवाल के सटीक जवाब ढूंढती
भई मैं भी तो बड़ी दीदी बनने वाली थी

सपने देखना तो जैसे खुली आँखों
का खेल बन गया था
तेरे इंतज़ार में मै भी 9 महीने से
कम न तड़पी होगी
रोज खबर लेती थी माँ से तेरी

सोचा न था माँ ने इतना न्यारा तोहफा
छुपा रखा था
मौजूद सारे खिलौनों से प्यारा था
लगा था जैसे सुनहरे सपने
की शुरुवात हुई थी
एक अनजाने रिश्ते से पहचान हुई थी

प्यार है तेरी हर अदा से
तेरी मुस्कान और तेरी रूठे चेहरे से
तेरी मंजूरी और तेरी छोटे छोटे नखड़ो से
है भाता ये प्यार का बंधन
हर रूप में।

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